Wednesday, February 27, 2019

पुलवामा हमले में मारे गए जवानों को पेंशन नहीं मिलेगी?: फ़ैक्ट चेक

सोशल मीडिया पर 14 फरवरी को पुलवामा चरमपंथी हमले में 40 केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) के जवानों की मौत के बाद से उनके और उनके परिवार वालों के प्रति सहानुभूति का सिलसिला जारी है.

लोगों ने टीवी और सोशल मीडिया पर 'शहीदों' और उनके परिवारों के लिए हमदर्दी और चिंताएं जताई हैं. लेकिन अधिकतर प्रतिक्रियाएं ग़लत सूचनाओं पर आधारित हैं

अधिकतर लोगों ने जवानों की पेंशन को लेकर चिंता जताई है.

बहुत से लोगों ने ट्विटर पर दावा किया है कि पुलवामा पीड़ित के 75 प्रतिशत परिवारों को पेंशन नहीं मिलेगी क्यूंकि वो 1972 की पुरानी पेंशन योजना के तहत कवर नहीं होते हैं. उन्होंने केंद्रीय सरकार से आग्रह किया है कि मारे गए जवानों के परिवारों को पुरानी पेंशन योजना के तहत लाने के लिए प्रयास किया जाए.

सीआरपीएफ़ और अन्य केंद्रीय पुलिस बल 1972 की केंद्रीय सिविल सेवा (सीसीएस) पेंशन योजना के तहत आते हैं. लेकिन 2004 के बाद सुरक्षा बल में शामिल होने वालों को किसी भी पेंशन योजना के तहत कवर नहीं किया जाता है.

सीआरपीएफ़ अधिकारियों के अनुसार पुलवामा हमले में मारे गए 40 में से 23 जवान 2004 के बाद फ़ोर्स में शामिल हुए थे. यही वजह है कि ट्विटर पर कई लोगों को डर है कि "शहीदों" के परिवारों को पेंशन नहीं मिलेगी. लेकिन, सीआरपीएफ़ के मुताबिक़ सभी 40 जवानों के परिवारों को पेंशन मिलेगी, चाहे वो सुरक्षा बल में 2004 के बाद ही क्यों न शामिल हुए हों.

इसकी पुष्टि करते हुए, सीआरपीएफ़ के प्रवक्ता और डीआईजी, मोज़ेज़ धीनाकरन ने बीबीसी से कहा, "उनकी शामिल होने की तारीखों के बावजूद, सभी शहीदों के परिवारों को "लिबरलाइज्ड पेंशन अवार्ड्स" दिया जाएगा जो आखिरी वेतन का 100% है और उसमें डीए भी जुड़ा है."

सीआरपीएफ़ प्रवक्ता का कहना है कि यह पेंशन ऑफर अर्धसैनिक बलों के उन सभी जवानों के परिवारों पर लागू होता है जो 2004 से पहले या बाद में सेवा में शामिल हुए थे, लेकिन देश में कहीं भी हुई कार्रवाई में मारे गए थे.

सोशल पर कई लोगों ने लिखा था कि पुलवामा में मारे गए "शहीदों" के परिवारों को भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) पैसे देगा. ये खबर पक्की है कि एसबीआई हर उस शहीद के परिवार को 30 लाख रुपये देगी जो अर्धसैनिक सेवा पैकेज के साथ पंजीकृत है. सीआरपीएफ का कहना है कि लगभग सभी अर्धसैनिक इस पैकेज का हिस्सा हैं. यह जीवन बीमा की तरह है.

1 करोड़ रुपये (दिल्ली सरकार. अब तक एक शहीद के परिवार को ), 50 लाख रुपये (हरियाणा सरकार); अन्य राज्य सरकारों द्वारा 10 लाख से 20-30 लाख रु.
राज्य सरकारें परिजनों को ज़मीन के प्लॉट, बच्चों के लिए शिक्षा, औद्योगिक शेड और अन्य लाभ भी दे सकती हैं.

नेता, पत्रकार और आम नागरिक उन्हें सम्मान देने के लिए शहीद कह सकते हैं लेकिन आधिकारिक तौर पर, वे शहीद नहीं हैं.

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी के ट्वीट में पुलवामा में मारे गए लोगों को शहीद बताया गया है. हमले के एक हफ्ते बाद उन्होंने ट्वीट किया: "बहादुर शहीद हुए हैं. उनके परिवार परेशान हैं. चालीस जवान अपनी जान दे देते हैं लेकिन "शहीद" के दर्जे से वंचित रह जाते हैं."

उन्होंने अपनी पार्टी के आगामी आम चुनावों में सत्ता में चुने जाने पर शहीदों का दर्जा देने का वादा किया.

कुछ दक्षिणपंथी पन्नों ने राहुल गांधी की जवानों को शहीदों के रूप में मान्यता नहीं देने पर उनकी आलोचना की है.

लेकिन राहुल गांधी गलत नहीं हैं.

सीआरपीएफ के पूर्व महानिरीक्षक वीपीएस पवार नागरिकों द्वारा व्यक्त भावनाओं की सराहना करते हैं. वह चाहते हैं कि मारे गए जवानों को वीर और शहीदों के रूप में याद किया जाए.

लेकिन, वे कहते हैं कि कई लोगों ने वास्तविकता को समझे बिना अपनी देशभक्ति दिखाई है. वह आगे कहते हैं, '' जनता की धारणा यह है कि जो भी अर्धसैनिक एक्शन में मारा जाता है वो शहीद होता है. लेकिन, आधिकारिक तौर पर उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया जाता है.

वह आगे कहते हैं, "यहां तक कि कार्रवाई में मारा गया एक भारतीय सेना का जवान भी शहीद नहीं है."

होता ये है कि एक्शन में एक जवान की मौत के बाद उसके परिवार को एक सरकारी प्रमाण पत्र दिया जाता है.

कार्रवाई में मारे गए सीआरपीएफ़ के एक जवान को बल के महानिदेशक द्वारा हस्ताक्षरित 'परिचालन आकस्मिक प्रमाण पत्र' दिया जाता है और भारतीय सेना के एक सैनिक को 'युद्ध हताहत प्रमाण पत्र' दिया जाता है.

सरकार आतंक का मुकाबला करने में मारे गए जवानों को श्रेणीबद्ध नहीं करती है. समाज उन्हें भावनात्मक कारणों से शहीद के रूप में देखता है.

2017 में, मोदी सरकार ने केंद्रीय सूचना आयोग से कहा था कि सेना या पुलिस बल में 'शहीद' नहीं है.

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