Thursday, December 27, 2018

कैसे पता चलता है कि जंगल में टाइगर कहां है?

इंसान, बोलने वाला इकलौता जानवर है. हम इशारों के अलावा शब्दों से भी अपने जज़्बातों का इज़हार कर लेते हैं. मगर आवाज़ निकालने या इशारे करने का काम केवल इंसान करते हों, ऐसा भी नहीं है.

दुनिया में तमाम जानवर हैं, जो ख़ुशी से लेकर ख़तरे तक को अलग-अलग आवाज़ें निकाल कर बताते हैं और साथियों को आगाह करते हैं.

जंगल में 'सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट' यानी 'योग्यतम की उत्तरजीविता' का सिद्धांत चलता है.

मतलब ये कि जो ताक़तवर होगा, माहौल के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेगा और ख़तरे को देखते ही चौकन्ना होकर वहां से निकलने में कामयाब होगा, वही बचेगा.

झुंड में रहने वाले जीव अक्सर साथियों को ख़तरे से आगाह करने के लिए ख़ास आवाज़ें निकालते हैं.

जानवरों के बीच काम करने वालों के लिए इन आवाज़ों की ख़ास अहमियत है.

अगर कोई जंगली जीवों पर डॉक्यूमेंट्री बना रहा हो तो ये आवाज़ें बहुत काम की हो सकती हैं.

अब जो लोग डॉक्यूमेंट्री बनाते हैं, वो जंगल के तमाम जीवों की आवाज़ों के मायने समझने की कोशिश करते हैं.

बीबीसी की सिरीज़ डायनेस्टीज़ की शूटिंग क़रीब पांच साल तक जंगलों में चली थी.

इस दौरान, कैमरामैन और शो के निर्देशक जिन जानवरों का पीछा कर रहे थे, उन्हें शिकार होने वाले जानवरों की आवाज़ों से काफ़ी मदद मिलती थी.

अब जैसे कि आप भारत में किसी घने जंगल में बाघ तलाश रहे हों, ताकि आप उसकी तस्वीर ले सकें, तो ये बहुत बड़ी चुनौती है.

ऐसे में बाघ को सटीक मौक़े पर पकड़ने का एक ही ज़रिया हो सकता है और वो है उसके शिकार बनने वाले जीवों की आवाज़.

क्योंकि बाघ तो बहुत ही सधे क़दमों से शिकार पर हमला बोलता है. ऐसे में शिकार होने वाले जानवरों की आवाज़ें ही फ़िल्मकारों की मदद करती हैं.

थियो वेब ने बीबीसी के पॉडकास्ट में बताया कि अगर एक बार बाघ जंगल में गुम हो गया तो उसे तलाशना नामुमकिन सा है. फिर चाहे आप ड्रोन को जंगल के ऊपर घुमा लें या सारी-सारी रात जागकर जंगल में बाघ के दोबारा शिकार की जगह आने का इंतज़ार कर लें.

बाघ जब शिकार के लिए निकलता है तो उसके शिकार बनने वाले जानवर बहुत चौकन्ने हो जाते हैं. वो अलग तरह की आवाज़ें निकाल कर अपने साथियों और दूसरे जानवरों को बाघ के ख़तरे से आगाह करते हैं.

Tuesday, December 18, 2018

IPL नीलामी 2019: जयदेव उनादकट, शिवम दुबे और वरुण को मिले करोड़ों

इंडियन प्रीमियर लीग के 12वें सीज़न के लिए नीलामी के पहले राउंड में जयदेव उनादकट, शिवम दुबे और वरुण चक्रवर्ती को चौंकाने वाली कीमतों पर खरीदा गया है.

आईपीएल में अब तक जिन खिलाड़ियों की नीलामी हुई है उनमें जयदेव उनादकट को सबसे ज़्यादा 8.4 करोड़ रुपए में ख़रीदा गया है.

लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब आईपीएल की बोली में जयदेव उनादकट को चौंकाने वाली कीमतों के साथ खरीदा गया हो.

साल 2017 में हुई नीलामी के दौरान तेज गेंदबाज उनादकट को 11.5 करोड़ रुपये में खरीदा गया था.

पिछले साल राजस्थान रॉयल्स के लिए खेल चुके उनादकट इस बार भी इसी टीम के लिए खेलेंगे.

उनादकट के प्रदेश गुजरात से ही आने वाले अक्षर पटेल को दिल्ली कैपिटल ने 5 करोड़ रुपये में खरीदा है जबकि उनका बेस प्राइस 1 करोड़ रुपये था.

बेस प्राइस पर बिके युवराज
मंगलवार दोपहर हुई नीलामी के दौरान युवराज सिंह को काफ़ी समय तक खरीदार नहीं मिले.

लेकिन नीलामी के काफ़ी समय बाद युवराज को आख़िरकार मुंबई इंडियंस ने 1 करोड़ रुपए में ही खरीद लिया है.

इसके साथ ही मार्टिन गुप्तिल और ब्रेंडन मैकुलम को भी अभी तक किसी टीम ने नहीं ख़रीदा है.

ऑस्ट्रेलियाई स्पिनर एडम ज़म्पा को भी अभी तक कोई खरीदार नहीं मिला है.

अंग्रेजी खिलाड़ी क्रिस वोक्स को भी अब तक कोई खरीदार नहीं मिला है.

इसके अलावा हाशिम अमला, केन रिचर्डसन, नमन ओझा, चेतेश्वर पुजारा, मनोज तिवारी, सौरभ तिवारी, ग्लेन फिलिप्स, मुशिफिक़र रहीम और एंगेलो मेथ्यूज़ को अब तक किसी ने नहीं खरीदा है.

वरुण चक्रवर्ती ने सबको चौंकाया
अगर सबसे ज़्यादा कीमत में बिकने वाले खिलाड़ियों की बात करें तो जयदेव उनादकट और वरुण चक्रवर्ती को 8.4 करोड़ रुपए में खरीदा गया है.

वहीं, किंग्स इलेवन पंजाब ने सैम कुरान को 7.2 करोड़ और दिल्ली कैपिटल ने कोलिन इनग्राम को 6.4 करोड़ रुपए में खरीदा गया है.

रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु ने 50 लाख रुपए की बेस प्राइस वाले वेस्ट इंडीज़ के खिलाड़ी शिमरॉन हेटमेयर को 4.2 करोड़ रुपए में ख़रीदा है.

दिल्ली कैपिटल ने 50 लाख बेस प्राइस वाले हनुमा विहारी को भी दो करोड़ रुपए में ख़रीदा है.

वहीं, किंग्स इलेवन पंजाब ने मोहम्मद शामी को 4.8 करोड़ रुपये में खरीदा है जबकि उनका बेस प्राइस 1 करोड़ रुपये था.

श्रीलंकन खिलाड़ी लसित मलिंगा को भी उनके बेस प्राइस 2 करोड़ रुपये में मुंबई इंडियंस ने खरीद लिया है.

चेन्नई सुपरकिंग्स ने मोहित शर्मा को पांच करोड़ रुपये में खरीदा है. राजस्थान रॉयल्स ने वरुण एरोन को 2.4 करोड़ रुपए में खरीदा है.

इसके साथ ही किंग्स इलेवन पंजाब ने 75 लाख रुपये के बेस प्राइस वाले निकोलस पूरन को 4.2 करोड़ रुपए में खरीदा है.

जॉनी बेयरस्टो को सनराइज़र्स हैदराबाद ने 2.2 करोड़ रुपये में खरीदा है जिनका बेस प्राइस 1.5 करोड़ रुपए रुपये था.

Friday, December 14, 2018

चीन ने एक साल में 88 गगनचुंबी इमारतें बनाईं, ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश

चीन ने इस साल 200 मीटर की ऊंचाई वाली 88 गगनचुंबी इमारतें (स्काईस्क्रैपर्स) बनाईं। इन्फ्रास्ट्रक्चर पर नजर रखने वाली काउंसिल ऑफ टॉल बिल्डिंग्स एंड अर्बन हैबिटेट के मुताबिक, ऊंची इमारतों के निर्माण के लिहाज से यह आंकड़ा ऐतिहासिक है। इतने स्काईस्क्रैपर्स अमूमन पूरे चीन में बनाए गए। यह इसलिए भी अहमियत रखता है कि इससे पहले इतने (88) स्काईस्क्रैपर किसी एक देश ने नहीं बनाए थे। यही नहीं, चीन में अमेरिका की तुलना में 13 गुना स्काईस्क्रैपर्स बनाए गए।

2018 के मुकाबले पिछले साल ज्यादा स्काईस्क्रैपर बने
अर्बन हैबिटेट के मुताबिक, दुनियाभर में इस साल 143 स्काईस्क्रैपर बनाए गए। यह अब तक का दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। 2017 में दुनिया में 147 स्काईस्क्रैपर बनाए गए थे। एक आकलन के मुताबिक, 2018 में चीन में 61.5% नई इमारतें बनीं। इनमें से 14 दक्षिणी चीन के शेनझेन में बनाई गईं। यह शहर लगातार तीसरे साल दुनिया के बेस्ट शहरों की रैंकिंग में टॉप पर रहा। शेनझेन के बाद दुबई, बीजिंग, न्यूयॉर्क का नंबर रहा।

चीन यून को वाइन पोत के आकार में बनाया गया है। 1,731 फीट (528 मीटर) की यह इमारत दुनिया की आठवीं सबसे ऊंची इमारत है। इस साल की सबसे ऊंची इमारतों के मामले में एशियाई शहरों का दबदबा रहा। इनमें हो ची मिन्ह सिटी (वियतनाम), चांग्शा, चीन के शहर शामिल हैं। इन जगहों पर पिछले 12 महीनों में 1312 फीट (400 मीटर) से भी ज्यादा ऊंची इमारतें बनाई गईं।

दक्षिण अमेरिका में ब्यूनस आयर्स (अर्जेंटीना), बोगोटा (कोलंबिया) में भी स्काईस्क्रैपर बनाए गए। सैन फ्रांसिस्को और मियामी में क्रमश: 326 मीटर (1,070 फीट) सेल्सफोर्स टावर और 252 मीटर (827 फीट) पैनोरमा टावर के रूप में स्काईस्क्रैपर बनाए गए हैं। एशिया से बाहर इस साल सबसे ऊंची इमारत के मामले में फिलाडेल्फिया का कॉमकास्ट टेक्नोलॉजी सेंटर 342 मीटर (1,121 फीट) है। यह शहर में सबसे ऊंचा स्काईस्क्रैपर है।

सीटीबीयूएच की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 में दुनिया में 120 मीटर से 150 नए स्काईस्क्रैपर बनाए जा सकते हैं। हालांकि, उसकी वार्षिक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि स्काईस्क्रैपर की बढ़ती संख्या से चीन की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, "अगर चीन के खिलाफ कोई टैरिफ लगाया जाता है तो वैश्विक निर्माण उद्योग, विशेष रूप से स्टील इम्पोर्ट के मामले में चीन को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।"

Thursday, November 22, 2018

इलाहाबाद का नाम तो बदल दिया पर इसे भुलाना आसान नहीं

'इलाहाबाद' का नाम अब 'प्रयागराज' हो गया है, घोषित तौर पर भी और आधिकारिक तौर पर भी.

अब जहां-जहां भी 'इलाहाबाद' शब्द है, उसे तुरंत बदल देने की इस क़दर क़वायद हो रही है, जैसे ये डर हो कि किसी कोने से ये लौटकर दोबारा न आ जाए.

लेकिन ये शब्द भी सरकार के पीछे कुछ इस तरह पड़ा है कि इसकी तुलना चूहे-बिल्ली के खेल वाले या फिर तू डाल-डाल, मैं पात-पात वाले मुहावरे से की जा सकती है.

यानी, सरकार इसे जितना ख़त्म करने की कोशिश कर रही है, घूम-फिर कर कहीं न कहीं से ये शब्द फिर सामने आ ही जा रहा है.

और ये एक ऐसे मौक़े पर सरकार की परेशानी का सबब बन रहा है जब वो कुंभ मेले की तैयारियों में लगी है और उससे पहले कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में व्यस्त है.

इलाहाबाद का प्रयागराज में नामकरण अब हुआ है लेकिन पहले लोग इन दोनों शहरों को अलग-अलग ही जानते थे, सिवाय प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के.

ऐसा शायद ही कोई हो जिसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुंह से पहले भी कभी 'इलाहाबाद' शब्द सुना हो.

वो इस शहर को प्रयागराज नाम से ही जानते और पुकारते रहे हैं.

पिछले साल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ से एक मुलाक़ात में जब मैंने ये सवाल किया कि क्या इलाहाबाद समेत कुछ शहरों के नाम बदलना भी उनके एजेंडे में है और है तो ये कब होगा, तो उन्होंने मुस्कराते हुए जवाब दिया, "जब करेंगे तो सबसे पहले आपको ही बताएंगे."

उनकी इस मुस्कराहट से ऐसा लगा कि शायद उनके एजेंडे में ये अभी नहीं है.

लेकिन कुंभ की तैयारियों के दौरान इलाहाबाद में जब अखाड़ा परिषद ने उनके सामने ये मांग रख दी तो उनसे रहा नहीं गया और फिर उन्होंने वहीं इसकी घोषणा ही कर दी.

स घोषणा के बाद ये तय हो गया कि कुंभ के पहले इलाहाबाद का नाम बदल जाएगा लेकिन इस घोषणा पर अमल अगली ही कैबिनेट बैठक में हो गया.

इलाहाबाद के बाद अयोध्या में भव्य दीपोत्सव के मौक़े पर योगी आदित्यनाथ ने फ़ैज़ाबाद का नाम बदलकर पूरे ज़िले का नाम अयोध्या कर दिया.

पिछले साल भी दीपोत्सव के मौक़े पर उन्होंने फ़ैज़ाबाद और अयोध्या नगर पालिकाओं को मिलाकर अयोध्या नगर निगम बनाने की घोषणा की थी.

सरकार का पीछा
ज़िले का नाम बदलने के बाद भी न तो फ़ैज़ाबाद शब्द ख़त्म हो रहा था और न ही इलाहाबाद.

मंडल यानी कमिश्नरी के नाम अब भी यही थे. आख़िरकार, एक कैबिनेट की बैठक में मंडलों के नाम भी बदल दिए गए.

अब राजस्व इकाई के तौर पर तो फ़ैज़ाबाद शब्द चला गया लेकिन इलाहाबाद शब्द सरकार का पीछा अभी भी नहीं छोड़ रहा है.

Monday, November 12, 2018

69% पाकिस्तानियों को नहीं पता किस चिड़िया का नाम है इंटरनेट

लगभग 69% पाकिस्तानी को इंटरनेट के बारे में पता ही नहीं है. इन्फॉर्मेशन कम्यूनिकेशन टेक्नॉलॉजी ने एक सर्वे किया है जिसमें कहा गया है कि 15 से 65 साल के बीच की उम्र वाले पाकिस्तानी को इंटरनेट क्या है इसकी कोई जानकारी ही नहीं है.

यह सर्वे श्री लंका बेस्ड द्वारा किया गया है जिसे पाकिस्तान के ही डॉन न्यूज ने सोमवार को इसे पब्लिश किया है. का दावा है कि उसने अपने सैंपलिंग मेथडोलॉजी में टार्गेट पॉप्यूलेशन का 98 फीसदी कवर किया है और इनमें 15 से 65 साल के उम्र के लोग हैं.

गौरतलब है कि यह सर्वे रिपोर्ट पाकिस्तान के 2,000 हाउसहोल्ड पर बेस्ड है. इस सर्वे को अक्टूबर-दिसंबर 2018 के दौरान किया गया.

LinreAsia के सीईओ हेलानी गलपया ने कहा है, ‘ पाकिस्तान टेलीकम्यूनिकेशन अथॉरिटी (PTA) की वेबसाइट पर 125 मिलियन ऐक्टिव सेल्यूयर यूजर्स हैं. यहां पर अच्छी सिम रजिस्ट्रेशन सिस्टम होने के बावजूद सब्सक्राइबर के बारे में यह नहीं लिखा है कि वो महिला हैं या पुरुष, अमीर हैं या गरीब और इससे यूसेज गैप को समझने और ऐक्सेस करने में इससे कोई सहायता नहीं मिलती’

इस स्टडी में एशियन कंट्रीज में इंटरनेट को लेकर जागरूकता न होने की तरफ इशारा किया गया है जो एक बड़ी समस्या है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इंटरनेट न यूज करने वाले लोगों में इसकी वजह इंटरनेट के बारे में जानकारी न होना है.

के सीईओ ने कहा है, ‘53% के पास फोन में इंटरनेट नहीं है. यह वक्त है उन्हें बेसिक फोन के बदले स्मार्टफोन देने का’ 

इस सर्वे पर पाकिस्तान टेलीकम्यूनिकेशन अथॉरिटी ने कोई भी बयान नहीं दिया है.

केंद्र सरकार ने पिछले एक साल में कम से कम 25 शहरों और गांवों के नाम बदलने के प्रस्ताव को हरी झंडी दी है जबकि नाम बदली करने के कई प्रस्ताव उसके पास लंबित हैं. इनमें पश्चिम बंगाल का नाम बदला जाना भी शामिल है. अधिकारिक सूत्रों ने ये जानकारी दी है. जिन इलाकों के नाम बदले गये हैं उस लिस्ट में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद और फैजाबाद ताजातरीन इजाफा है.

कई प्रस्तावों को केंद्र सरकार की इजाजत का इंतजार है. इनमें पश्चिम बंगाल का नाम ‘बांग्ला’ करने का भी प्रस्ताव भी शामिल है. यह प्रक्रिया काफी लंबी है और इसमें कई केंद्रीय मंत्रालय और विभाग भी शामिल होते हैं. गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने एजेंसी भाषा को बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पिछले एक साल में देश के विभिन्न हिस्सों में 25 शहरों और गांवों के नाम बदलने के प्रस्तावों को सहमति दी है.

इलाहाबाद का प्रस्ताव पेंडिंग

उन्होंने बताया कि इलाहाबाद का नाम प्रयागराज और फैजाबाद का नाम अयोध्या करने के प्रस्ताव अभी तक उत्तर प्रदेश सरकार ने मंत्रालय को नहीं भेजे हैं. कुछ अनुमोदित नाम परिवर्तन प्रस्तावों में से कुछ हैं: आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में राजामुंदरी का नाम राजामहेंद्रवर्मन, आउटर व्हीलर आईलैंड का नाम एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप, केरल के मालाप्पुरा जिले में अरिक्कोड को अरीकोड, हरियाणा में जींद जिले के पिंडारी को पांडु पिंडारा, नगालैंड के खिफिरे जिले में सनफुर का नाम सामफुरे करने के प्रस्ताव शामिल हैं.

इसके अलावा महाराष्ट्र में सांगली जिले में लंगडेवाडी का नाम नरसिंहगांव, हरियाणा में रोहतक जिले में सांपला का नाम चौधरी सर छोटूराम नगर करने के प्रस्ताव शामिल हैं. एक अन्य अधिकारी ने कहा कि गृह मंत्रालय संबंधित एजेंसियों के परामर्श से मौजूदा दिशानिर्देशों के अनुसार ऐसे प्रस्तावों को स्वीकार करता है. गृह मंत्रालय रेल मंत्रालय, डाक विभाग और भारत सर्वेक्षण विभाग से कोई आपत्ति नहीं होने के बाद किसी भी स्थान के नाम बदलने के लिए अपनी सहमति देता है.

कैसे बदलता है नाम

इन संगठनों को यह पुष्टि करना है कि प्रस्तावित नाम का उनके रिकॉर्ड में ऐसा कोई नगर या गांव नहीं है. किसी राज्य के नामकरण के लिए संसद में साधारण बहुमत के साथ संविधान में संशोधन की आवश्यकता होती है जबकि गांव या शहर के नाम को बदलने के लिए, एक कार्यकारी आदेश की आवश्यकता होती है. उन्होंने बताया राज्य सरकार के सुझाव के तहत पश्चिम बंगाल का नाम 'बांग्ला' करने का प्रस्ताव हाल ही में गृह मंत्रालय ने राय जानने के लिए विदेश मंत्रालय भेजा गया क्योंकि प्रस्तावित नाम पड़ोसी देश बांग्लादेश के नाम से समान था.