Tuesday, March 26, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: भोपाल दिग्विजय सिंह के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से कांग्रेस के प्रत्याशी दिग्विजय सिंह के नाम की घोषणा के साथ ही अब यह लोकसभा क्षेत्र हर किसी के लिए चर्चा का केंद्र बन गया है. भोपाल सीट को भाजपा के लिये एक सेफ सीट माना जाता रहा है लेकिन दिग्विजय सिंह के उतर जाने से अब यहां पर दिलचस्प मुक़ाबला देखने को मिल सकता है.

हालांकि भाजपा ने अभी यह साफ़ नही किया है कि उनकी तरफ से कौन उम्मीदवार होगा लेकिन दिग्विजय सिंह का नाम आने के साथ ही कई नाम उछाले जा रहे हैं जो भाजपा की तरफ से चुनाव लड़ सकते है.

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शनिवार को एक कार्यक्रम में पत्रकारों से चर्चा करते हुये घोषणा की कि दिग्विजय सिंह भोपाल लोकसभा सीट से काग्रेंस के प्रत्याशी होंगे.

देर रात पार्टी ने अपने प्रत्याशियों की सूची जारी करते हुये दिग्विजय सिंह के नाम का ऐलान कर दिया. भोपाल की सीट पर आख़िरी बार काग्रेंस के प्रत्याशी ने 1984 में जीत दर्ज की थी.

कमलनाथ से जब दिग्विजय सिंह के बारे में पत्रकारों ने पूछा तो उन्होंने कहा, "मैं एक घोषणा कर सकता हूं. सेन्ट्रल इलेक्शन कमेटी में दिग्विजय सिंह जी का नाम भोपाल से फ़ाइनल हो गया है. मैंने उनसे अनुरोध किया था कि आप लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं. इसलिए आप राजगढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ो, यह आपको जंचता नहीं है. मैंने उनसे कहा कि भोपाल, इंदौर या जबलपुर जैसी मुश्किल सीट से लड़ें. इस पर दिग्विजय सिंह ने सहमति दे दी. "

हालांकि दिग्विजय सिंह पहले ही घोषणा कर चुके थे कि पार्टी उन्हें जहां से भी लड़ाएगी वहां से वह चुनौती स्वीकार करने के लिये तैयार है.

दिग्विजय सिंह की घोषणा के बाद मालेगाव ब्लास्ट मामले में अभियुक्त प्रज्ञा ठाकुर ने भी उनके ख़िलाफ़ टिकट की मांग की है. प्रज्ञा ठाकुर महसूस करती है कि जो कुछ भी उनके साथ हुआ है उसके लिये दिग्विजय सिंह ही ज़िम्मेदार रहे हैं. इसलिए उनकी चाहत उनके ख़िलाफ़ मैदान में उतरने की है.

साध्वी प्रज्ञा ने पत्रकारों से बात करते हुए दिग्विजय सिंह को देश का दुश्मन बताया. उन्होंने कहा, "मैं देश के दुश्मनों के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए तैयार हूं. "

साध्वी प्रज्ञा, मध्यप्रदेश के भिंड की रहने वाली है. उनको मालेगांव बम ब्लास्ट के एक अभियुक्त के तौर पर जाना जाता है.

वहीं एक दूसरा नाम पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का चल रहा है. संभावना व्यक्त की जा रही है कि शिवराज सिंह चौहान भाजपा के प्रत्याशी हो सकते है.

हालांकि शिवराज सिंह चौहान लगातार बोलते रहे हैं कि वह केंद्र की राजनीति में जाने के इच्छुक नहीं हैं लेकिन अगर पार्टी फ़ैसला करेंगी तो उनके पास कोई विकल्प नहीं रह जाएगा.

रविवार को मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष राकेश सिंह से जब शिवराज सिंह चौहान के भोपाल से चुनाव लड़ने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, "यह फ़ैसला केंद्रीय नेतृत्व को करना है."

वही शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि पार्टी जो फ़ैसला करेंगी उसे मैं मानूंगा. उन्होंने कहा, "दिग्विजय सिंह की उम्मीदवारी भाजपा के लिए किसी भी तरह से कोई चुनौती नहीं है."

वही भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने भी भोपाल से चुनाव लड़ने में दिलचस्पी दिखाई है. उन्होंने कहा, "यदि पार्टी ने चुनाव लड़ने का पूछा तो दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ना पसंद करुंगा."

इस सब के बीच माना जा रहा है कि भाजपा सोमवार को भोपाल के बारे में फ़ैसला ले सकती है. लेकिन दिग्विजय सिंह का भोपाल से चुनाव लड़ना बताता है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच सब कुछ ठीक नही चल रहा है.

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच जो रिश्ते विधानसभा चुनाव के दौरान बने थे उनमें अब ख़ास तौर पर दरारें देखी जा सकती है. कमलनाथ का यह कहना कि दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को कड़ी टक्कर वाली सीटों से लड़ना चाहिए बताता है कि दोनों में अब वह बात नहीं रही जो विधानसभा चुनाव के वक़्त थी.

दोनों की तल्ख़ी की एक वजह दिग्विजय सिंह का इंदौर से कमलनाथ से फोन का स्पीकर खोल कर बात करना भी है. इस बात को स्थानीय मीडिया ने उछाला भी. लेकिन काग्रेंस के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि, "कांग्रेस का एक बड़ा नेता जब मुख्यमंत्री से बात कर रहा हो तो वह कैसे स्पीकर खोल कर दोनों की बातों को दूसरों को सुनवा सकता है. यह बात हैरान करने वाली है."

इसके अलावा भी कई मुद्दे हैं जिसकी वजह से दोनों में दूरियां बढ़ गई है और कमलनाथ को यह मौका मिला है कि दिग्विजय सिंह को ऐसी सीट से लड़ाया जाए जहां से जीतना दिग्विजय सिंह के लिए किसी भी सूरत में आसान नहीं होगा.

राजधानी भोपाल वह सीट है जहां पर कांग्रेस के बड़े नेताओं ने अपनी किस्मत अज़माई है लेकिन वह इस सीट से निकल नहीं पाए हैं. इस सीट नवाब मंसूर अली खान पटौदी और सुरेश पचौरी भी चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन वह भी इस सीट पर कांग्रेस को जीत नहीं दिला पाए.

राजनैतिक विश्लेषक शिव अनुराग पटैरिया भोपाल सीट के बारे में बताते हैं कि यह सीट भाजपा का गढ़ बन चुकी है. उन्होंने बताया, " दिग्विजय सिंह बड़े दिनों के बाद सक्रिय राजनीति में भोपाल में आकर खड़े हुए हैं. यह 1984 तक कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी. लेकिन 1989 से भाजपा ने सारे पत्ते खोले और सुशील चंद्र वर्मा को उतारा जो कायस्थ समाज के थे. शहर में कायस्थ समाज के वोट बड़ी तादाद में है. दूसरे नंबर पर ब्राह्मण मतदाता है. ऐसे में यह सीट वाक़ई में दिग्विजय सिंह के लिए चुनौती है."

भोपाल लोकसभा सीट का अपना महत्व है. यहां पर 8 विधानसभा सीटें है इनमें से 3 में कांग्रेस और 5 पर भाजपा का कब्ज़ा है. तक़रीबन 18 लाख मतदाताओं वाले इस क्षेत्र में मुसलमानों की तादाद लगभग 4 लाख होगी. इसके बावजूद राजगढ़ के इस राजा के लिए राजधानी को फ़तह कर पाना उतना आसान नहीं दिख रहा है.

Wednesday, March 20, 2019

मोदी की 'चौकीदारी' पर बोले असली चौकीदार: बेरोज़गार हूं साहब, इसलिए चौकीदार हूं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार शाम साढ़े चार बजे देश के 25 लाख चौकीदारों को संबोधित करने वाले हैं. वे 31 मार्च को चौकीदारों के साथ वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग करेंगे. ये सब आयोजन "मैं भी चौकीदार" अभियान के तहत हो रहे हैं. मगर चुनाव में अपनी चर्चा पर चौकीदारों का क्या कहना है, वो चौकीदारी क्यों करते हैं, वो चौकीदार देश सेवा के लिए बने हैं या हालात ने उन्हें चौकीदार बना दिया. भारत की राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के कुछ चौकीदारों की ज़िंदगी की एक झलक.

"मैं इस मार्केट की सुरक्षा में तैनात हूं. चौकीदारी का मतलब है यहां नज़र रखना और जहां तक मेरी नज़र जाती है उसकी रखवाली करना. कुछ ग़लत होता है तो उसकी रिपोर्ट देना. बैठे रहना या सो जाना चौकीदारी नहीं है, बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी निभाना ही चौकीदारी है. यहां जो भी कुछ ग़लत होगा उसका मैं ही ज़िम्मेदार हूं."

28 साल के जितेंद्र सिंह कोरी उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद से नोएडा आकर सुरक्षा गार्ड का काम करते हैं. वो यहां महीने के तीसों दिन, हर रात, 12 घंटे सुरक्षा में तैनात रहते हैं.

उनकी इस मेहनत के बदले महीने के आख़िर में नौ हज़ार रुपए नक़द मिलते हैं. अगर किसी मजबूरी में कोई छुट्टी कर ली तो उस दिन का दोगुना वेतन गंवाना पड़ता है. उन्हें याद नहीं है कि उन्होंने आख़िरी बार काम से छुट्टी कब ली थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने नाम के साथ चौकीदार लगा लिया. सिर्फ़ मोदी ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी के अन्य मंत्रियों और कार्यकर्ताओं ने भी ऐसा ही किया. देश भर में 'मैं भी चौकीदार हूं' अभियान चलाया गया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा विपक्षी कांग्रेस के 'चौकीदार ही चोर' है चुनावी नारे के जबाव में कर रहे हैं.

लेकिन, उनके इस क़दम ने जितेंद्र सिंह जैसे चौकीदारों को कुछ देर के लिए ही सही, गर्व ज़रूर महसूस कराया है.

जितेंद्र सिंह कहते हैं, जब अख़बार में पढ़ा कि प्रधानमंत्री ने अपने नाम के आगे चौकीदार लगाया है तो बहुत गर्व हुआ.

लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या वो अपने काम से ख़ुश हैं तो उन्होंने कहा, "बेरोज़गार हूं, इसलिए चौकीदार हूं. अगर और कोई बेहतर काम मिलता तो ये काम नहीं करता. यहां मेहनत का मोल नहीं है."

वो कहते हैं, "हमारे फ़िरोज़ाबाद में चूड़ियों का काम होता है, दिन भर काम करो तो डेढ़-दो सौ रुपए बनते हैं. इतने में परिवार नहीं चलता इसलिए घर से बाहर निकले और सुरक्षा गार्ड की नौकरी की क्योंकि मेरे पास और कोई टैलेंट भी नहीं है. सिक्योरिटी सिर्फ़ ज़िम्मेदारी का काम है, और ज़िम्मेदारी हम निभा लेते हैं."

जितेंद्र सिंह कहते हैं, "दूर से देखने से ये आसान काम लगता है लेकिन जो चौकीदारी करता है वो ही जानता है कि ये कितने ज़ोख़िम का काम है. हम सारी रात ड्यूटी करते हैं, हमारे साथ कुछ भी हो सकता है."

वो कहते हैं, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आपको चौकीदार कहा है, अब जब चौकीदार नाम रख ही लिया है तो चौकीदारों और बेरोज़गारों के बारे में वो कुछ सोचें भी.

23 साल के दीपक कुमार झा बिहार के भागलपुर से आकर सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर रहे हैं. उन्हें और कोई बेहतर काम नहीं मिला तो ये काम कर रहे हैं. जितेंद्र की ही तरह वो भी बिना छुट्टी रोज़ाना बारह घंटे ड्यूटी करते हैं.

वो कहते हैं, "चौकीदारी का काम कर रहे हैं मज़बूरी में. महीने में नौ हज़ार मिलता है, कुछ नहीं बच पाता. हाल ही में बहन की शादी की तो पच्चीस हज़ार का क़र्ज़ हो गया. जो कमाते हैं वो यहीं रहने खाने-पीने में ख़त्म हो जाता है. दो हज़ार रुपए बचते हैं, उससे क्या होगा. क़र्ज़ भी नहीं उतर पाएगा."

वो कहते हैं, "ये मुश्किल काम है. सारी रात जगना पड़ता है. अगर आठ घंटे की ड्यूटी हो, महीने में चार छुट्टी मिल जाएं तो यही काम अच्छा लगने लगे."

वो कहते हैं, "बहुत बार कोशिश की, कोई काम नहीं लगा इसलिए रात भर जग रहे हैं. अपने आप को ख़र्च कर रहे हैं."

60 साल के राम सिंह ठाकुर बीस साल से चौकीदारी कर रहे हैं. उन्होंने मजबूरी में ये काम शुरू किया था और अब भी मजबूरी में ही कर रहे हैं.

राम सिंह को महीने के साढ़े आठ हज़ार रुपए मिलते हैं. बाकी गार्डों की ही तरह उन्हें भी छुट्टी नहीं मिलती. वो कहते हैं, "कंपनी की ओर से कोई सुविधा नहीं मिलती. न बीमा, न पीएफ़, बीमार हो जाओ तो घर भेज देते हैं, कोई वेतन नहीं मिलता."

राम सिंह कहते हैं, "प्रधानमंत्री ने अपने आपको चौकीदार कहा, अच्छा लगा. उनकी योजनाएं अच्छी हैं. लागू हो जाएं तो और भी अच्छा है."

जब मैं राम सिंह, जितेंद्र और दीपक से बात कर रही थी तो रात के क़रीब दो बज रहे थे. उन्होंने आसपास पड़े गत्ते इकट्ठा करके आग जला ली. ऐसा वो सर्दी से नहीं बल्कि मच्छरों से बचने के लिए कर रहे थे. वो कहते हैं, 'अगर मच्छर ने काटा और बीमार पड़ गए तो कहीं के नहीं रहेंगे.'

चौकीदारी के काम में गली के कुत्ते उनके साथ रात के पहरेदार हैं. पास ऐसे बैठते हैं जैसे बहुत गहरी दोस्ती हो.

रात के ढाई बजे हैं. नोएडा के ही एक दूसरे कोने में एक निर्माणस्थल के बाहर वेदराम अपनी बंदूक लिए मुस्तैदी से बैठे हैं. मूलरूप से उत्तर प्रदेश के हरदोई के रहने वाले वेदराम 1992 से चौकीदारी का काम कर रहे हैं. लेकिन, आज तक न उनका कोई पहचान पत्र बन पाया है न कोई पीएफ़ खाता है. उन्हें आज भी वेतन नक़द ही मिलता है.

वेदराम कहते हैं, "मैं इतनी बड़ी साइट पर काम कर रहा हूं लेकिन मेरा वेतन है सिर्फ़ 11 हज़ार रुपए है."

वो कहते हैं, "न हमें कोई छुट्टी मिलती है, न दवा मिलती है. प्रधानमंत्री अच्छा काम कर रहे हैं, उन्होंने हमें सुविधाएं दी होंगी, हम पढ़े-लिखे नहीं हैं इसलिए हमें कुछ मिल नहीं पाता."

जब मैं वेदराम से बात कर रही थी तब उनके साथ तैनात दूसरे सुरक्षा गार्ड को उल्टी हुई. उन्होंने बताया कि शाम से बीमार हैं, लेकिन छुट्टी लेने पर पैसे कटते हैं इसलिए छुट्टी नहीं ले पाए.

वो बोले, "मजबूरी में चौकीदारी का काम कर रहे हैं. परिवार से दूर हैं. तीज-त्योहार पर भी छुट्टी नहीं मिल पाती है."

Thursday, March 7, 2019

असमः बीजेपी सरकार एक तोला सोना दे तलाक़ कैसे रोकेगी

असम की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने जब से ग़रीब परिवारों की बेटियों को शादी के समय एक तोला (करीब 10 ग्राम) सोना देने का ऐलान किया है, वो सवालों के घेरे में आ गई है. इसकी एक बड़ी वजह अगले महीने के अंत तक होने वाले लोकसभा चुनाव भी है.

दरअसल, नागरिकता संशोधन विधेयक वाले मुद्दे को लेकर प्रदेश में व्यापक स्तर पर लोगों की नाराज़गी झेल चुकी भाजपा पर लोकसभा चुनाव से पहले इस तरह की लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा करने के आरोप भी लग रहे हैं.

हाल ही में प्रदेश की सरकार ने वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए पेश किए गए अपने बजट में अरुंधति योजना के तहत सालाना पांच लाख रुपए से कम आय वाले परिवार की बेटियों को शादी के समय एक तोला सोना देने की घोषणा की है.

राज्य सरकार के अनुसार इस योजना का फ़ायदा आर्थिक रूप से कमज़ोर सभी समुदाय के लोगों को मिलेगा. फिर चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान.

लेकिन बजट में इस योजना की घोषणा करने वाले राज्य के वित्त मंत्री हिमंत विश्व सरमा के कुछ तर्क लोगों को रास नहीं आ रहें है.

वित्त मंत्री सरमा ने इस योजना पर कहा था कि युवतियों को विवाह के लिए एक तोला सोना देने से जहां कई समुदायों में शादी के समय सोना देने की प्रथा का पालन होगा वहीं इससे हिंदू और मुसलमानों में तलाक़ जैसी सामाजिक बुराइयां कम की जा सकेंगी.

वित्त मंत्री ने पिछले महीने बिहपुरिया के डोंगीबिल में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था," एक अप्रैल के बाद प्रदेश में जितनी भी लड़कियों की शादी होगी राज्य सरकार सभी को एक तोला सोना देगी.''

उन्होंने कहा, ''लेकिन इसके लिए सामाजिक विवाह से दो महीने पहले या फिर दो महीने बाद सभी समुदाय की युवतियों को संबंधित इलाक़े के विवाह पंजीयक के पास जाकर पहले विवाह पंजीकृत करवाना होगा तभी जाकर उन्हे एक तोला सोना मिलेगा. इसके लिए लड़की की उम्र 18 साल और लड़के की उम्र 21 साल होना ज़रूरी है."

अपने भाषण में मंत्री कहते हैं," इस योजना के ज़रिए बाल विवाह पर रोक लगेगी और मुसलमान समाज में तीन बार तलाक़, तलाक़, तलाक़ कह कर महिला को छोड़ना संभव नहीं होगा. न ही मंदिरों में शादी करने वाले लोग अपनी पत्नी को छोड़ सकेंगे. क्योकि इसके लिए उसे क़ानूनी तौर पर भी तलाक़ लेना होगा जिसके तहत दुल्हन को गुजारा भत्ता देने की शर्त रहेगी."

मुस्लिम समाज से आने वाली 27 साल की मनीषा बेगम मंत्री की इस बात से किसी भी तरह सहमत नहीं है. बीबीसी से बात करते हुए मनीषा कहती हैं, "सरकार अगर यह सोचती है कि एक तोला सोना देने से शादी नहीं टूटेगी या फिर तलाक़ नहीं होंगे, ये बिलकुल गलत है. शादियां टूटने के कई और कारण होते हैं. दो लोगों के बीच विवाह जैसा बंधन आपसी समझ से निभाया जाता है. सोना देने की बात से शादी के बंधन का कोई लेनादेना नहीं होता है."

हाल ही में सगाई के बंधन में बंधी मनीषा कहती हैं, "सरकार की इस योजना से हो सकता है गरीब लोगों को अपनी बेटी की शादी के समय कुछ मदद मिलें लेकिन सरकार को महिला सशक्तीकरण की दिशा में ज्यादा काम करने की ज़रूरत है. अगर आर्थिक रूप से कमजोर लड़कियों को अच्छी शिक्षा मिलेगी, नौकरी मिलेगी तो वे ख़ुद अपने लिए न केवल सोना ख़रीद सकेंगी बल्कि जीवनभर के लिए आत्मनिर्भर बनेंगी."

मनीषा यह भी स्वीकार करती हैं कि कई बार इस तरह की सरकारी योजनाओं का लाभ उन लोगों को मिल जाता है जिन्हें इसकी ज़रूरत भी नहीं होती है और कई बार ज़रूरतमंद लोग इससे वंचित रह जाते है. सरकार को यह भी देखना होगा.

इसी क्रम में वित्त मंत्री की बात पर असहमति जताते हुए गायत्री चौधरी कहती हैं, "ऐसा बिलकुल नहीं है कि सोना दे देने से शादी से जुड़ी समस्याएं खत्म हो जाएंगी. सरकार लड़कियों को शिक्षा और रोज़गार देकर मज़बूत बनाने का काम करें. तभी वे इन मुश्किलों के ख़िलाफ़ लड़ सकेंगी."

वो कहती हैं, "असम एक ऐसा प्रदेश है जहां लड़कियां काफ़ी शिक्षित है. हमारे यहां दूसरे प्रदेशों के मुक़ाबले दहेज प्रथा कभी नहीं रही. सरकार पढ़ी-लिखी लड़कियों को उनकी क़ाबिलियत के अनुसार नौकरी देने की व्यवस्था करें. उच्च शिक्षा की चाहत रखने वाली लड़कियों की आर्थिक रूप से मदद करें. अगर लोग ग़रीब और अशिक्षित रहेंगे तो उन्हें सोना देने से समस्याएं कम होने की बजाय ज़्यादा बढ़ेंगी."

"ग़रीबी रेखा से नीचे वाले लोग 34 हज़ार रुपए का एक तोला सोना लेने के लिए अपने लड़के-लड़कियों की जल्दी शादी करवा देंगे, उससे उन्हें बाद में और समस्याएं होंगी. सरकारी योजना का फ़ायदा लेने के लिए कुछ लोग फर्जीवाड़ा भी करेंगे."

तमिलनाडु के बाद असम देश का दूसरा ऐसा राज्य है जहां की सरकार ने लड़कियों को शादी के समय सोना देने की योजना का ऐलान किया है.

इससे पहले 2011 में तमिलनाडु में जयललिता सरकार ने दसवीं से आगे की पढ़ाई करने वाली लड़कियों को 25 हजार रुपये और चार ग्राम सोना जबकि स्नातक लड़कियों को सोने के सिक्के के साथ 50 हजार रुपये देने की योजना चलाई थी.

बाद में साल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने लड़कियों की शादी में सहायता के लिए आठ-आठ ग्राम के सोने के सिक्के देने की भी एक योजना शुरू की थी.

तलाक़ जैसी पीड़ा से गुजर चुकी बेनज़ीर अरफ़ान कहती हैं, "एक तोला सोना देने से किसी का तलाक़ रुकने वाला नहीं है. अगर सरकार प्रदेश की लड़कियों के लिए कुछ अच्छा करना चाहती है तो उसे सरकारी नौकरी दें zताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो सके."

"मैं ख़ुद तीन तलाक की शिकार हुई हूं. मेरा तलाक़ ज़मीन ज़ायदाद को लेकर हुआ था. कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाना एक महिला के लिए कितना मुश्किल काम होता है, मैं समझ सकती हूं. क्योंकि मैं इस परेशानी से गुजर चुकी हूं. लिहाजा सरकार एक तोला सोना देने का लालच देने के बदले महिलाओं का भविष्य सुरक्षित करें ताकि आगे चलकर उसे किसी के सामने हाथ फैलाना न पड़े."

असम में भाजपा सरकार की इस योजना को कई लोगों ने सही बताया है तो कइयों का मानना है कि लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भगवा पार्टी खासतौर से मध्यम वर्ग वाले मतदाताओं को ऐसी योजनाओं से अपनी तरफ़ लाने के प्रयास में है.

सोशल मीडिया पर भी ज़्यादातर महिलाओं की प्रतिक्रिया थीं कि एक तोला सोना के बदले सरकारी नौकरी दी जाती या फिर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाता तो लड़किया ज़्यादा मज़बूत होती.

कुछ लोग इसे दहेज को बढ़ावा देने की बात से भी जोड़कर देख रहें है. लेकिन वित्त मंत्री शर्मा का कहना है,"ये दहेज नहीं है क्योंकि सरकार सोना लड़के को नहीं दे रही है. यह लड़की के नाम पर दिया जाएगा."