प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार शाम साढ़े चार बजे देश के 25 लाख चौकीदारों को संबोधित करने वाले हैं. वे 31 मार्च को चौकीदारों के साथ वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग करेंगे. ये सब आयोजन "मैं भी चौकीदार" अभियान के तहत हो रहे हैं. मगर चुनाव में अपनी चर्चा पर चौकीदारों का क्या कहना है, वो चौकीदारी क्यों करते हैं, वो चौकीदार देश सेवा के लिए बने हैं या हालात ने उन्हें चौकीदार बना दिया. भारत की राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के कुछ चौकीदारों की ज़िंदगी की एक झलक.
"मैं इस मार्केट की सुरक्षा में तैनात हूं. चौकीदारी का मतलब है यहां नज़र रखना और जहां तक मेरी नज़र जाती है उसकी रखवाली करना. कुछ ग़लत होता है तो उसकी रिपोर्ट देना. बैठे रहना या सो जाना चौकीदारी नहीं है, बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी निभाना ही चौकीदारी है. यहां जो भी कुछ ग़लत होगा उसका मैं ही ज़िम्मेदार हूं."
28 साल के जितेंद्र सिंह कोरी उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद से नोएडा आकर सुरक्षा गार्ड का काम करते हैं. वो यहां महीने के तीसों दिन, हर रात, 12 घंटे सुरक्षा में तैनात रहते हैं.
उनकी इस मेहनत के बदले महीने के आख़िर में नौ हज़ार रुपए नक़द मिलते हैं. अगर किसी मजबूरी में कोई छुट्टी कर ली तो उस दिन का दोगुना वेतन गंवाना पड़ता है. उन्हें याद नहीं है कि उन्होंने आख़िरी बार काम से छुट्टी कब ली थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने नाम के साथ चौकीदार लगा लिया. सिर्फ़ मोदी ही नहीं बल्कि उनकी पार्टी के अन्य मंत्रियों और कार्यकर्ताओं ने भी ऐसा ही किया. देश भर में 'मैं भी चौकीदार हूं' अभियान चलाया गया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा विपक्षी कांग्रेस के 'चौकीदार ही चोर' है चुनावी नारे के जबाव में कर रहे हैं.
लेकिन, उनके इस क़दम ने जितेंद्र सिंह जैसे चौकीदारों को कुछ देर के लिए ही सही, गर्व ज़रूर महसूस कराया है.
जितेंद्र सिंह कहते हैं, जब अख़बार में पढ़ा कि प्रधानमंत्री ने अपने नाम के आगे चौकीदार लगाया है तो बहुत गर्व हुआ.
लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या वो अपने काम से ख़ुश हैं तो उन्होंने कहा, "बेरोज़गार हूं, इसलिए चौकीदार हूं. अगर और कोई बेहतर काम मिलता तो ये काम नहीं करता. यहां मेहनत का मोल नहीं है."
वो कहते हैं, "हमारे फ़िरोज़ाबाद में चूड़ियों का काम होता है, दिन भर काम करो तो डेढ़-दो सौ रुपए बनते हैं. इतने में परिवार नहीं चलता इसलिए घर से बाहर निकले और सुरक्षा गार्ड की नौकरी की क्योंकि मेरे पास और कोई टैलेंट भी नहीं है. सिक्योरिटी सिर्फ़ ज़िम्मेदारी का काम है, और ज़िम्मेदारी हम निभा लेते हैं."
जितेंद्र सिंह कहते हैं, "दूर से देखने से ये आसान काम लगता है लेकिन जो चौकीदारी करता है वो ही जानता है कि ये कितने ज़ोख़िम का काम है. हम सारी रात ड्यूटी करते हैं, हमारे साथ कुछ भी हो सकता है."
वो कहते हैं, प्रधानमंत्री मोदी ने अपने आपको चौकीदार कहा है, अब जब चौकीदार नाम रख ही लिया है तो चौकीदारों और बेरोज़गारों के बारे में वो कुछ सोचें भी.
23 साल के दीपक कुमार झा बिहार के भागलपुर से आकर सुरक्षा गार्ड की नौकरी कर रहे हैं. उन्हें और कोई बेहतर काम नहीं मिला तो ये काम कर रहे हैं. जितेंद्र की ही तरह वो भी बिना छुट्टी रोज़ाना बारह घंटे ड्यूटी करते हैं.
वो कहते हैं, "चौकीदारी का काम कर रहे हैं मज़बूरी में. महीने में नौ हज़ार मिलता है, कुछ नहीं बच पाता. हाल ही में बहन की शादी की तो पच्चीस हज़ार का क़र्ज़ हो गया. जो कमाते हैं वो यहीं रहने खाने-पीने में ख़त्म हो जाता है. दो हज़ार रुपए बचते हैं, उससे क्या होगा. क़र्ज़ भी नहीं उतर पाएगा."
वो कहते हैं, "ये मुश्किल काम है. सारी रात जगना पड़ता है. अगर आठ घंटे की ड्यूटी हो, महीने में चार छुट्टी मिल जाएं तो यही काम अच्छा लगने लगे."
वो कहते हैं, "बहुत बार कोशिश की, कोई काम नहीं लगा इसलिए रात भर जग रहे हैं. अपने आप को ख़र्च कर रहे हैं."
60 साल के राम सिंह ठाकुर बीस साल से चौकीदारी कर रहे हैं. उन्होंने मजबूरी में ये काम शुरू किया था और अब भी मजबूरी में ही कर रहे हैं.
राम सिंह को महीने के साढ़े आठ हज़ार रुपए मिलते हैं. बाकी गार्डों की ही तरह उन्हें भी छुट्टी नहीं मिलती. वो कहते हैं, "कंपनी की ओर से कोई सुविधा नहीं मिलती. न बीमा, न पीएफ़, बीमार हो जाओ तो घर भेज देते हैं, कोई वेतन नहीं मिलता."
राम सिंह कहते हैं, "प्रधानमंत्री ने अपने आपको चौकीदार कहा, अच्छा लगा. उनकी योजनाएं अच्छी हैं. लागू हो जाएं तो और भी अच्छा है."
जब मैं राम सिंह, जितेंद्र और दीपक से बात कर रही थी तो रात के क़रीब दो बज रहे थे. उन्होंने आसपास पड़े गत्ते इकट्ठा करके आग जला ली. ऐसा वो सर्दी से नहीं बल्कि मच्छरों से बचने के लिए कर रहे थे. वो कहते हैं, 'अगर मच्छर ने काटा और बीमार पड़ गए तो कहीं के नहीं रहेंगे.'
चौकीदारी के काम में गली के कुत्ते उनके साथ रात के पहरेदार हैं. पास ऐसे बैठते हैं जैसे बहुत गहरी दोस्ती हो.
रात के ढाई बजे हैं. नोएडा के ही एक दूसरे कोने में एक निर्माणस्थल के बाहर वेदराम अपनी बंदूक लिए मुस्तैदी से बैठे हैं. मूलरूप से उत्तर प्रदेश के हरदोई के रहने वाले वेदराम 1992 से चौकीदारी का काम कर रहे हैं. लेकिन, आज तक न उनका कोई पहचान पत्र बन पाया है न कोई पीएफ़ खाता है. उन्हें आज भी वेतन नक़द ही मिलता है.
वेदराम कहते हैं, "मैं इतनी बड़ी साइट पर काम कर रहा हूं लेकिन मेरा वेतन है सिर्फ़ 11 हज़ार रुपए है."
वो कहते हैं, "न हमें कोई छुट्टी मिलती है, न दवा मिलती है. प्रधानमंत्री अच्छा काम कर रहे हैं, उन्होंने हमें सुविधाएं दी होंगी, हम पढ़े-लिखे नहीं हैं इसलिए हमें कुछ मिल नहीं पाता."
जब मैं वेदराम से बात कर रही थी तब उनके साथ तैनात दूसरे सुरक्षा गार्ड को उल्टी हुई. उन्होंने बताया कि शाम से बीमार हैं, लेकिन छुट्टी लेने पर पैसे कटते हैं इसलिए छुट्टी नहीं ले पाए.
वो बोले, "मजबूरी में चौकीदारी का काम कर रहे हैं. परिवार से दूर हैं. तीज-त्योहार पर भी छुट्टी नहीं मिल पाती है."
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