इंसान, बोलने वाला इकलौता जानवर है. हम इशारों के अलावा शब्दों से भी अपने जज़्बातों का इज़हार कर लेते हैं. मगर आवाज़ निकालने या इशारे करने का काम केवल इंसान करते हों, ऐसा भी नहीं है.
दुनिया में तमाम जानवर हैं, जो ख़ुशी से लेकर ख़तरे तक को अलग-अलग आवाज़ें निकाल कर बताते हैं और साथियों को आगाह करते हैं.
जंगल में 'सर्वाइवल ऑफ़ द फिटेस्ट' यानी 'योग्यतम की उत्तरजीविता' का सिद्धांत चलता है.
मतलब ये कि जो ताक़तवर होगा, माहौल के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेगा और ख़तरे को देखते ही चौकन्ना होकर वहां से निकलने में कामयाब होगा, वही बचेगा.
झुंड में रहने वाले जीव अक्सर साथियों को ख़तरे से आगाह करने के लिए ख़ास आवाज़ें निकालते हैं.
जानवरों के बीच काम करने वालों के लिए इन आवाज़ों की ख़ास अहमियत है.
अगर कोई जंगली जीवों पर डॉक्यूमेंट्री बना रहा हो तो ये आवाज़ें बहुत काम की हो सकती हैं.
अब जो लोग डॉक्यूमेंट्री बनाते हैं, वो जंगल के तमाम जीवों की आवाज़ों के मायने समझने की कोशिश करते हैं.
बीबीसी की सिरीज़ डायनेस्टीज़ की शूटिंग क़रीब पांच साल तक जंगलों में चली थी.
इस दौरान, कैमरामैन और शो के निर्देशक जिन जानवरों का पीछा कर रहे थे, उन्हें शिकार होने वाले जानवरों की आवाज़ों से काफ़ी मदद मिलती थी.
अब जैसे कि आप भारत में किसी घने जंगल में बाघ तलाश रहे हों, ताकि आप उसकी तस्वीर ले सकें, तो ये बहुत बड़ी चुनौती है.
ऐसे में बाघ को सटीक मौक़े पर पकड़ने का एक ही ज़रिया हो सकता है और वो है उसके शिकार बनने वाले जीवों की आवाज़.
क्योंकि बाघ तो बहुत ही सधे क़दमों से शिकार पर हमला बोलता है. ऐसे में शिकार होने वाले जानवरों की आवाज़ें ही फ़िल्मकारों की मदद करती हैं.
थियो वेब ने बीबीसी के पॉडकास्ट में बताया कि अगर एक बार बाघ जंगल में गुम हो गया तो उसे तलाशना नामुमकिन सा है. फिर चाहे आप ड्रोन को जंगल के ऊपर घुमा लें या सारी-सारी रात जागकर जंगल में बाघ के दोबारा शिकार की जगह आने का इंतज़ार कर लें.
बाघ जब शिकार के लिए निकलता है तो उसके शिकार बनने वाले जानवर बहुत चौकन्ने हो जाते हैं. वो अलग तरह की आवाज़ें निकाल कर अपने साथियों और दूसरे जानवरों को बाघ के ख़तरे से आगाह करते हैं.
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